वो टोपी
सच सच बताना
वो टोपी तोहफ़ा है ना उसका
जिसे पहनकर तुम्हें उसके विसाल का एहसास रहता है
तुम मेरे साथ रहकर
मुझे अपने बालों की खुशबू में लपेटे हुए
अपनी झूठी सी बातों में भी
उस टोपी को अपने करीब रख
उससे अपने इश्क को जस्टिफाई करती थी ना
सच सच बताना
वो जो तुम हाथ पकड़कर चलती थी मेरा
या वो जो बिन बोला इश्क तुम
मुझसे करती थी
जिसे तुम सिर्फ महसूस कर पाने वाला कहती थी
सब झूठ था ना
हर बार बस यही कहकर यकीन दिलाती थी मुझे
कि नहीं, मुझे ऐतबार नहीं है तुम पर
और फिर तुम उससे ऐतबार को जस्टिफाई करने
उस टोपी को पहन लेती थी ना
सच सच बताना
वो जो सुबह शाम की बातें
तुमने 4 लफ्ज़ों में खत्म कर दी
कुछ फर्क नहीं पड़ा ना
टोपी थी ना तुम्हारे पास
पहन लिया होगा उसे फिर से
या फिर मुझे एहसास ही नहीं था
कि तुमने मुझसे मिलते समय
कभी उतारी ही नहीं थी वो टोपी
खूब कमाल थी तुम्हारी ज़बान
बहुत सी बातें कहीं
पर शब्दों की कोई अहमियत नहीं थी ना
ख़ैर तुम्हारी फितरत नहीं पर फिर भी
सच सच बताना
वो टोपी तोहफ़ा है ना उसका।
-राहुल
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