महफ़िल
भरी महफ़िल में पढ़ूँ तो मज़ाक़ उड़ाया जाता है मेरे जज़्बातों में लिपटे इन पन्नो को मेरी कमज़ोरी का हिसाब बताया जाता है खून से रंगे है ये हाथ जिनसे लिखता हूँ मैं कभी कभी उसके मोहल्ले में मुझे मेरे दिल का कातिल बताया जाता है ।। पढ़ते हैं तो सब पूछते हैं मुझसे कि मेरे लिखने की वजह क्या है और फिर, हर मुलाक़ात पर दोहराकर यही सवाल मुझसे मेरे लिखने का गुनाह क़बूल करवाया जाता है ।। कोई पूछता क्यूं नहीं आख़िर तेरी आँखों से सवाल मेरे गुनाहों का तोहमत हर बार शराब पर ही क्यूँ लगाया जाता है ।। क्यूँ है ये, के इन जज़्बातों को लपेटे रखता हूँ मैं इंसान हूँ, इक दिल मैं भी रखता हूँ तुम तोड़ दो इसे तो कोई ग़म नहीं पर मैं इस बहते खून को इक किताब में समेटूँ तो, मुझे दोषी क्यूँ ठहराया जाता है।। मैं भरी महफ़िल में पढ़ूँ तो मज़ाक़ उड़ाया जाता है ।। - राहुल