अंजान शहर
आज अपने ही शहर में अंजान हूँ मैं| आज घर से निकलूं तो, हर एक चेहरा नया सा लगता है, इस तेजी से बढ़ते समय से अब डर सा लगता है, इस दिन-ब-दिन बदलती दुनिया से, परेशान हूँ मैं, आज अपने ही शहर में अनजान हूँ मैं| मोहल्ले के बच्चे अब बड़े हो गये, जहाँ हरे भरे खेत थे अब वहां मॉल खड़े हो गए, जहाँ खेलते थे बचपन में क्रिकेट, उस छोटे सी पिच को याद कर, परेशान हूँ मैं आज अपने ही शहर में अनजान हूँ मैं| तन्हाई महफ़िल और महफ़िल तन्हाई बन गयी, वो महफ़िलों की हसी बस परछाई बन गयी, उन दोस्तों से फिर बात करने को, अब दिल चाहता है, क्यूंकि आज अपने से ही बात कर-कर परेशान हूँ मैं, आज अपने ही शहर में अनजान हूँ मैं|