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अंजान शहर

आज अपने ही शहर में अंजान हूँ मैं| आज घर से निकलूं तो, हर एक चेहरा नया सा लगता है, इस तेजी से बढ़ते समय से अब डर सा लगता है, इस दिन-ब-दिन बदलती दुनिया से, परेशान हूँ मैं, आज अपने ही शहर में अनजान हूँ मैं| मोहल्ले के बच्चे अब बड़े हो गये, जहाँ हरे भरे खेत थे अब वहां मॉल खड़े हो गए, जहाँ खेलते थे बचपन में क्रिकेट, उस छोटे सी पिच को याद कर, परेशान हूँ मैं आज अपने ही शहर में अनजान हूँ मैं| तन्हाई महफ़िल और महफ़िल तन्हाई बन गयी, वो महफ़िलों की हसी बस परछाई बन गयी, उन दोस्तों से फिर बात करने को, अब दिल चाहता है, क्यूंकि आज अपने से ही बात कर-कर परेशान हूँ मैं, आज अपने ही शहर में अनजान हूँ मैं|

ज़िन्दगी का हमसफ़र

अकेले रहकर ऐ दोस्त तूने क्या पाया, न किसी को अपना कर सका,  और न किसी का हो पाया| केसा था ये ज़िन्दगी का रास्ता जिसमे न कोई मोड़, और न कोई अंत आया| न मिला तुझे, हमसफ़र इस ज़िन्दगी के रस्ते का, और जो मिला, उस से न तू निभा पाया| पत्थर बहुत थे रस्ते पे, पर तूने अकेले ही लड़कर, सबका पार पाया.... पहुँचा तू अपनी मंजिल तक य नहीं, इसका जवाब ! क्यूँ आज तक तू खुद भी न जान पाया| ऐ ज़िन्दगी के पथिक, अगर किसी को साथ लेता, तो शायद मंजिल तक जल्दी पहुँचता, और ! अपनी इस किस्मत को, ऐसे न कोसता| पहुँचता तू अवश्य अपनी मंजिल पर, लेता अगर किसी का साथ, ये पूरा बीड़ा तूने अपने सर ही क्यों उठाया? क्या थी वजह अकेले जीने की, क्यूँ था ज़िन्दगी में इतना सन्नाटा छाया, दर दर की ठोकरे खायीं, फिर भी हाथ कुछ न आया...... अकेले रहकर ऐ दोस्त....... . . ...तूने क्या पाया।। - Rahul Garg

एक इंसान (A Person)

एक इंसान ज़िन्दगी बदल देता है, वह ज़िन्दगी संवार देता है, कभी बिगाड़ देता है, कभी असर नहीं होता, तो कभी वही इंसान बन जाता है । कभी हम नहीं सुनते उसकी, तो कभी उसकी बातें कानों में गूंजती हैं, कभी साथ देता है वो, तो कभी अकेला सा कर जाता है, वह है हर एक इंसान, कभी मिलना चाहते हैं हम उस से तो कभी न चाहकर भी ये ज़माना उस से मिलवाता है, जिसके लिए हम एक अन्य इंसान हैं, और वही इंसान, इस इंसान को एक नया इंसान बना जाता है । ये केसा अजीब खेल है कुदरत का, न कोई जान पाता है, और न कोई समझ पाता है। - Rahul Garg

ज़िन्दगी चलने सी लगी

(ज़िन्दगी चलने सी लगी) युहीं कभी थका बैठा, उठा इंसान और चला, तो मनो, ज़िन्दगी चलने सी लगी, आया जब वहीँ, मुश्किलों का तूफ़ान, तो मनो, कमर टूट सी गयी, चला था वह अपने डर पर पाने काबू, डर आया सामने तो मनो, सांस सूख सी गयी, पर नहीं, बढ़ा वह हिम्मत से आगे, तो मुश्किलें और बढ़ गयी, सोचा था उसने के इस डर पर पा लूंगा काबू, मगर फिर हिम्मत डगमगाने सी लगी, ज़िन्दगी ने फिर अँधेरा दिखाया, तो किसी की ने कहा "आगे बढ़ो, रौशनी मिलेगी", वह फिर उठा और चला, तो मनो, ज़िन्दगी चलने सी लगी| -- Rahul Garg

बचपन की याद

वो पानी में तराई कश्ती, अब वापस नहीं आती| वो पक्षियों की आवाज़, अब और नहीं भाती || कूद जाते थे जिस दिवार को लांघ कर, आज वो दिवार कहीं नज़र नहीं आती || जिन रंगों से बनाते थे विभिन्न चित्र, आज वो रंगीन कला बस किताबों में है आती || वो पहली साइकिल का आनंद, वो पहली चोट का दर्द, वो पहले बैट का रन, वो पहले मैच की हार, वो गलियों के खेल, वो हंसी की बौछार, अब तो बस इनकी याद ही है आती || हे भगवान! कुछ वापिस दे सको, तो देना मेरा बचपन, क्योंकि बड़े होने की सोच अब और नहीं आती || बेइन्तहां मोहब्बत हो गयी थी उस बचपन से, सच कहते हैं लोग के पहली मोहब्बत रास नहीं आती| -Rahul Garg