ज़िन्दगी का हमसफ़र

अकेले रहकर ऐ दोस्त तूने क्या पाया,
न किसी को अपना कर सका, 
और न किसी का हो पाया|

केसा था ये ज़िन्दगी का रास्ता
जिसमे न कोई मोड़,
और न कोई अंत आया|
न मिला तुझे,
हमसफ़र इस ज़िन्दगी के रस्ते का,
और जो मिला,
उस से न तू निभा पाया|

पत्थर बहुत थे रस्ते पे,
पर तूने अकेले ही लड़कर,
सबका पार पाया....
पहुँचा तू अपनी मंजिल तक य नहीं,
इसका जवाब !
क्यूँ आज तक तू खुद भी न जान पाया|

ऐ ज़िन्दगी के पथिक,
अगर किसी को साथ लेता,
तो शायद मंजिल तक जल्दी पहुँचता,
और !
अपनी इस किस्मत को,
ऐसे न कोसता|
पहुँचता तू अवश्य अपनी मंजिल पर,
लेता अगर किसी का साथ,
ये पूरा बीड़ा तूने अपने सर ही क्यों उठाया?

क्या थी वजह अकेले जीने की,
क्यूँ था ज़िन्दगी में इतना सन्नाटा छाया,
दर दर की ठोकरे खायीं,
फिर भी हाथ कुछ न आया......



अकेले रहकर ऐ दोस्त.......
.


.
...तूने क्या पाया।।

- Rahul Garg

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