ज़िन्दगी चलने सी लगी

(ज़िन्दगी चलने सी लगी)

युहीं कभी थका बैठा,
उठा इंसान और चला, तो मनो,
ज़िन्दगी चलने सी लगी,
आया जब वहीँ,
मुश्किलों का तूफ़ान, तो मनो,
कमर टूट सी गयी,
चला था वह अपने डर पर पाने काबू,
डर आया सामने तो मनो,
सांस सूख सी गयी,
पर नहीं,
बढ़ा वह हिम्मत से आगे,
तो मुश्किलें और बढ़ गयी,
सोचा था उसने के इस डर पर पा लूंगा काबू,
मगर फिर हिम्मत डगमगाने सी लगी,
ज़िन्दगी ने फिर अँधेरा दिखाया,
तो किसी की ने कहा "आगे बढ़ो, रौशनी मिलेगी",
वह फिर उठा और चला, तो मनो,
ज़िन्दगी चलने सी लगी|
-- Rahul Garg

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