एक और लिख लूं सोचा शायद ये गम कम हो जाए 
तेरे इंतजार में जो वक्त थमा था वो शायद वापस वक्त हो जाए ।

तुझे चाहा है खुद से भी ज्यादा, इसको कहूं या लिखूं 
तेरे तक कोई यह बात ही पहुंचा दे, इतना तरस तो खुदा मुझ पर खाए ।

भरे मां के दरबार में तेरी दुआ की थी तुझे बता कर, तुझे याद है?
एक तथास्तु तो मां, मेरी दुआ को भी दे दिया जाए ।

गमगीन सा है सब तेरे बिना यहां, सब जगह मायूसी सी छाई है 
तुझे कोई और शहर रास आ जाए, तो ए खुदा इस बस्ती में आग लग जाए ।

मैं टूट चुका हूं, मैं हार चुका हूं, पर एक उम्मीद अब भी बाकी है 
अब भी एक दफा तू पलट कर देख ले, तो ये जलती हुई बस्ती भी, लंका हो जाए ।

- राहुल 

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