कैद
पहले कुछ बेचैनियां रख कर जी रहे थे हर रोज़
अब तेरे दिए कुछ ज़ख्म इस दिल में क़ैद हैं
वो बेवफ़ा तो नहीं थे यह तो ' शायद ' यकीन है हमें
पर ' शायद ' वह किसी बेवफ़ा की ज़ंजीरों में क़ैद हैं
जानने के लिए कुछ साल चाहिए या बस एक मौसम काफ़ी था
वो पतझड़ के पत्ते तो बस अब इन सर्द रातों में क़ैद हैं
मेरे जज्बातों को तूने महज़ अलफाज़ो के धुएं में उड़ा दिया जान-ए-जाँ
तेरी कही बातें तो अक्षरश: अब भी ज़हन में क़ैद हैं
चंद लफ्ज़ों में ढल गई तेरे लिए शाम इस कहानी की
मेरी तो सुबह अब भी तेरे खत के इंतजार में क़ैद हैं
एतबार की बातें किया करते थे वो बेवफाई के सौदागर
हमारा उनसे सौदा खरीदना भी हमारी किस्मत में क़ैद है
जान-ए-जाँ ! तेरी याद के सहारे यह जिंदगी तो कट जाएगी
पर जीते-जी मौत देने की सज़ा तो तेरे गुनाहों की किताब में क़ैद हैं
-राहुल
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