मदिरा का दीवाना
मदिरा का दीवाना हाँ, इस नाम से बुलाते हैं अब मेरे दोस्त मुझे आखिर क्या कहूं अब मैं इस कांच के इन लबों को छूते ही, जब ये शराब गले को चीरती हुयी अंदर जाती है तो तुम्हारी यादों के भवंडर में घिरा ये दिल मनो कुछ ठहराव सा महसूस करता हो, और हर एक बूँद के साथ फिर ज़हन में दौड़ते ख्वाबों-ए-खून की इस सुनामी को मनो जैसे कोई किनारा सा मिल जाता हो। मैं, वो शीत ऋतु की छुट्टियों में तुम्हारी ज़ुल्फ़ों के नीचे बैठ कंपकपाने वाली इस हवा के बीच तुम्हारी बाँहों की गर्मी को अकेले ही इस जाम को अपने होठों से लगाकर महसूस कर पता हूँ कैसे समझाऊँ मैं, के ये नशा शराब का नहीं तुम्हारे साथ बिताये हुए हर एक पल का है जिसे मैं भूला नहीं सकता। हाँ, जनता हूँ के बहुत कम हैं ऐसे पल जो हमने साथ में सांझे किये हों, पर काफी हैं काफी हैं के जब मैं अगली घूँट के बाद इन आँखों को मूंदूँ तो तुम्हारे उन सुनहरे बालों को अपने चेहरे पर महसूस कर पाऊं काफी हैं के जब कोई पूछे हमसे के कौन हैं वो तो ज़िन्दगी के लम्हों की किताब में बस तुम्हारे नाम के पन्ने बचें और काफी है के आज की ये मायूस रात भी उतनी ...