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Showing posts from 2018

कलम की आवाज़

एहसास हुआ आज के, कलम को आवाज देनी बहुत जरूरी है, वरना मनोदशा के अनुसार लोग, अलग-अलग अर्थ सोच लेते हैं। ज़ुबानी वार्तालाप होना अनिवार्य है, नहीं तो ख़त लिखो अमन-ओ-शांति के लिए, और लोग धमकी समझ लेते हैं। -Rahul

Fear of expressing love

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Jannat

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इश्क और नफ़रत

कुछ खफ़ा-खफ़ा से हैं मेरे दोस्त, आजकल मेरी खामोशी पर, आखिर कारण क्या बतलायूं मैं, मुझे इश्क और नफ़रत पूरी शिद्दत से निभाना, दोनों, एक ही शख्स सिखा गया है.... - Rahul Garg

Baarish

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मदिरा का दीवाना

मदिरा का दीवाना हाँ, इस नाम से बुलाते हैं अब मेरे दोस्त मुझे आखिर क्या कहूं अब मैं इस कांच के इन लबों को छूते ही, जब ये शराब गले को चीरती हुयी अंदर जाती है तो तुम्हारी यादों के भवंडर में घिरा ये दिल मनो कुछ ठहराव सा महसूस करता हो, और हर एक बूँद के साथ फिर ज़हन में दौड़ते ख्वाबों-ए-खून की इस सुनामी को मनो जैसे कोई किनारा सा मिल जाता हो। मैं, वो शीत ऋतु की छुट्टियों में तुम्हारी ज़ुल्फ़ों के नीचे बैठ कंपकपाने वाली इस हवा के बीच तुम्हारी बाँहों की गर्मी को अकेले ही इस जाम को अपने होठों से लगाकर महसूस कर पता हूँ कैसे समझाऊँ मैं, के ये नशा शराब का नहीं तुम्हारे साथ बिताये हुए हर एक पल का है जिसे मैं भूला नहीं सकता। हाँ, जनता हूँ के बहुत कम हैं ऐसे पल जो हमने साथ में सांझे किये हों, पर काफी हैं काफी हैं के जब मैं अगली घूँट के बाद इन आँखों को मूंदूँ तो तुम्हारे उन सुनहरे बालों को अपने चेहरे पर महसूस कर पाऊं काफी हैं के जब कोई पूछे हमसे के कौन हैं वो तो ज़िन्दगी के लम्हों की किताब में बस तुम्हारे नाम के पन्ने बचें और काफी है के आज की ये मायूस रात भी उतनी ...

कुछ कहना चाहता हूँ

कुछ कहना चाहता हूँ तुमसे पर समय का बंधा हूँ मैं याद है वो घड़ी जो तुमने दी थी बहुत खुश था मैं पर महसूस नहीं किया था के शायद उसी घड़ी की सुईयों में मैं यूँ उलझ के रह जाऊंगा अब जब तुम नहीं हो तो कभी कभी मैं तन्हाई के इस आलम में तुम्हे याद कर सोचता हूँ काश वो घड़ी की जगह उस दिन कुछ वक़्त दे दिया होता| कुछ कहना था तुमसे कुछ कहना है तुमसे बस थोड़ी दे ही सही पर रुक जाओ मेरे लिए शायद ये कंपकपाती हुयी ज़ुबान तेज़ी से धड़कता दिल और हज़ारों बातों से घिरा दिमाग एक पल के लिए रुक जाये और मैं शायद कुछ कह पाऊं हर बार की तरह इन अकेली रातों में तुम्हारी यादों के सहारे अपने तकिये के नीचे औंधे मुँह घंटों रोने के बाद कलम उठाकर नहीं तुम्हारे समक्ष बैठकर तुम्हारी आँखों में डूबते हुए और इस दिल की सुनते हुए इस बार शायद मैं वो बात कह पाऊं थोड़ी देर बस थोड़ी देर और रुक जाओ, कुछ कहना चाहता हूँ तुमसे | - Rahul Garg
कुछ तो समझने की कोशिश कर मेरी इस दर्द-ए-खामोशी को, ऐसा ना हो कि पलकों पे सजाए ये ख्वाब इन्हीं आंसुओं की नदी में ही बह जाएं। - Rahul Garg
यूं पत्थर की तराशी हुई मूर्ति नहीं, जो दर्द चेहरे पर न आए, अजि इंसान हूं, दिल है,   भरेगा तो, रोएंगे भी। - Rahul Garg

कलम

जुनून नहीं था यूं कलम उठाने का हमें, बस दिल की बात आप समझे नहीं, और ये ख़ून सी स्याही बहने लगी। - Rahul Garg

Understanding LIFE

इस भाग दौड़ की ज़िंदगी में, मैं रोज विचार बदल रहा हूं। उस रोज़, जब मैं परेशान था, तो गम के सिरहाने, तनहाई के आंचल में बैठ, आंसुओं की बारिश में भीगते हुए, मैं, वो हर एक दिन, हर एक पल, को कोस रहा था जिसने मुझे, अकेलेपन का एहसास दिलाया। परंतु, वहीं इक रोज़, खुशीयों के आंगन में, हंसी के सिरहाने, ख्वाबों के आंचल में बैठ, चेहरे पर मुस्कुराहट लिए, मैं, ज़िंदगी के उन हसीन लम्हों को भी, याद कर रहा था, जिन्होंने मुझे खुशियों के इस सागर से परिचित कराया। अब इसे समय का खेल कहो या मेरी नादानी, पर समय के इसी खेल में, जिंदगी को समझने की कोशिश कर रहा हूं मैं, शायद इसीलिए हर रोज़, विचार बदल रहा हूं मैं। - Rahul Garg

इश्क

अरसों से खाली पड़े, भरने लगें हैं ये कोरे पन्ने, न जाने इश्क इस कलम से हुआ है, या तुमसे। - Rahul Garg

Imaginative Talks

रोज़ बात करने के बावजूद भी, समझते नहीं हैं वो मुझे, आखिर उनकी भी क्या गलती कहूं, मात्र! एक चित्र ही तो है उनका... मेरे पास बात करने के लिए। - Rahul Garg

यादें

इक हम हैं कि जो हर पल, बिना किसी वजह उन्हें याद करते हैं, जाने फिर भी क्यों हमें वो, भुलाने के कारण देते जा रहे हैं। - Rahul Garg

Reason to live on

Sit in an absolute silence, Close your eyes, Listen to the breeze, Listen to your past.. That laughter, That sorrow, That excitement, That suffering, That pain, You are product of all that, Think about it, Analyze that, Something you choose, Somewhere you never had a choice, All that has passed, And you are still alive, Keep thinking, keep living.. - Rahul Garg

वो पतंग

कुछ यूं ढील दी मैंने मांझे को उस पतंग की खातिर के एक गलती की हवा चली, और उसका रुख़ ही बदल गया। ऐसा नहीं कि मैंने, कोशिश नहीं की समेटने की, पर इस हवा ने शायद, डोर को ही कमज़ोर कर दिया। क्या वो पतंग मेरी नहीं थी? या डोर नहीं संभाली मैंने? क्या किसी और डोर ने काट दिया? या कुसूर उस हवा का था? . . नहीं जानता हूं मैं.... अब.. ना पतंग है ना डोर, बस हूं, तो मैं, मेरी तनहाई, और ये हवा है, जो हर पल तोड़ रही है मुझे। - Rahul Garg