वो पतंग

कुछ यूं ढील दी मैंने मांझे को
उस पतंग की खातिर
के एक गलती की हवा चली,
और उसका रुख़ ही बदल गया।

ऐसा नहीं कि मैंने,
कोशिश नहीं की समेटने की,
पर इस हवा ने शायद,
डोर को ही कमज़ोर कर दिया।

क्या वो पतंग मेरी नहीं थी?
या डोर नहीं संभाली मैंने?
क्या किसी और डोर ने काट दिया?
या कुसूर उस हवा का था?
.
.
नहीं जानता हूं मैं....

अब..
ना पतंग है ना डोर,
बस हूं,
तो मैं, मेरी तनहाई,
और ये हवा है,
जो हर पल तोड़ रही है मुझे।

- Rahul Garg

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