Posts

Showing posts from September, 2015

ज़िन्दगी का हमसफ़र

अकेले रहकर ऐ दोस्त तूने क्या पाया, न किसी को अपना कर सका,  और न किसी का हो पाया| केसा था ये ज़िन्दगी का रास्ता जिसमे न कोई मोड़, और न कोई अंत आया| न मिला तुझे, हमसफ़र इस ज़िन्दगी के रस्ते का, और जो मिला, उस से न तू निभा पाया| पत्थर बहुत थे रस्ते पे, पर तूने अकेले ही लड़कर, सबका पार पाया.... पहुँचा तू अपनी मंजिल तक य नहीं, इसका जवाब ! क्यूँ आज तक तू खुद भी न जान पाया| ऐ ज़िन्दगी के पथिक, अगर किसी को साथ लेता, तो शायद मंजिल तक जल्दी पहुँचता, और ! अपनी इस किस्मत को, ऐसे न कोसता| पहुँचता तू अवश्य अपनी मंजिल पर, लेता अगर किसी का साथ, ये पूरा बीड़ा तूने अपने सर ही क्यों उठाया? क्या थी वजह अकेले जीने की, क्यूँ था ज़िन्दगी में इतना सन्नाटा छाया, दर दर की ठोकरे खायीं, फिर भी हाथ कुछ न आया...... अकेले रहकर ऐ दोस्त....... . . ...तूने क्या पाया।। - Rahul Garg

एक इंसान (A Person)

एक इंसान ज़िन्दगी बदल देता है, वह ज़िन्दगी संवार देता है, कभी बिगाड़ देता है, कभी असर नहीं होता, तो कभी वही इंसान बन जाता है । कभी हम नहीं सुनते उसकी, तो कभी उसकी बातें कानों में गूंजती हैं, कभी साथ देता है वो, तो कभी अकेला सा कर जाता है, वह है हर एक इंसान, कभी मिलना चाहते हैं हम उस से तो कभी न चाहकर भी ये ज़माना उस से मिलवाता है, जिसके लिए हम एक अन्य इंसान हैं, और वही इंसान, इस इंसान को एक नया इंसान बना जाता है । ये केसा अजीब खेल है कुदरत का, न कोई जान पाता है, और न कोई समझ पाता है। - Rahul Garg

ज़िन्दगी चलने सी लगी

(ज़िन्दगी चलने सी लगी) युहीं कभी थका बैठा, उठा इंसान और चला, तो मनो, ज़िन्दगी चलने सी लगी, आया जब वहीँ, मुश्किलों का तूफ़ान, तो मनो, कमर टूट सी गयी, चला था वह अपने डर पर पाने काबू, डर आया सामने तो मनो, सांस सूख सी गयी, पर नहीं, बढ़ा वह हिम्मत से आगे, तो मुश्किलें और बढ़ गयी, सोचा था उसने के इस डर पर पा लूंगा काबू, मगर फिर हिम्मत डगमगाने सी लगी, ज़िन्दगी ने फिर अँधेरा दिखाया, तो किसी की ने कहा "आगे बढ़ो, रौशनी मिलेगी", वह फिर उठा और चला, तो मनो, ज़िन्दगी चलने सी लगी| -- Rahul Garg