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Showing posts from December, 2022

समन्दर

दूर से ताक रहे थे हम समन्दर को नजाने क्यों वो पास आ गया  हम यहीं ठीक ही तो थे नजाने क्यों वो पास बुला गया  कुछ कदम बढ़ा के हम आगे चले गए  फिर नजाने क्यों वो दूर भाग गया अब मैं वहीं रुकूं लहर के इंतज़ार में या नहीं नजाने क्यों ये सवाल मुझे अंदर से खा गया ए 'राहुल ' शायद तेरी गलती ही थी तू समन्दर की फितरत पहचानने में धोखा खा गया

कैद

पहले कुछ बेचैनियां रख कर जी रहे थे हर रोज़  अब तेरे दिए कुछ ज़ख्म इस दिल में क़ैद हैं वो बेवफ़ा तो नहीं थे यह तो ' शायद ' यकीन है हमें  पर ' शायद ' वह किसी बेवफ़ा की ज़ंजीरों में क़ैद हैं जानने के लिए कुछ साल चाहिए या बस एक मौसम काफ़ी था  वो पतझड़ के पत्ते तो बस अब इन सर्द रातों में क़ैद हैं मेरे जज्बातों को तूने महज़ अलफाज़ो के धुएं में उड़ा दिया जान-ए-जाँ  तेरी कही बातें तो अक्षरश: अब भी ज़हन में क़ैद हैं चंद लफ्ज़ों में ढल गई तेरे लिए शाम इस कहानी की  मेरी तो सुबह अब भी तेरे खत के इंतजार में क़ैद हैं एतबार की बातें किया करते थे वो बेवफाई के सौदागर हमारा उनसे सौदा खरीदना भी हमारी किस्मत में क़ैद है जान-ए-जाँ ! तेरी याद के सहारे यह जिंदगी तो कट जाएगी  पर जीते-जी मौत देने की सज़ा तो तेरे गुनाहों की किताब में क़ैद हैं -राहुल 

किताब

दिल लगाया जिस से भी  पूरी शिद्दत के साथ लगाया  दर्द की जंजीर बंधी है, ये मालूम था  पर इस डर से कदम पीछे ना हटाया  अरे तुम पर एक किताब लिखता  ऐसा सोचा था मैंने '.......'  तुमने तो चार पन्नों में ही  अपना फ़रेबी रूप सामने ले आया।

वो टोपी

सच सच बताना  वो टोपी तोहफ़ा है ना उसका  जिसे पहनकर तुम्हें उसके विसाल का एहसास रहता है  तुम मेरे साथ रहकर  मुझे अपने बालों की खुशबू में लपेटे हुए  अपनी झूठी सी बातों में भी  उस टोपी को अपने करीब रख  उससे अपने इश्क को जस्टिफाई करती थी ना  सच सच बताना वो जो तुम हाथ पकड़कर चलती थी मेरा  या वो जो बिन बोला इश्क तुम  मुझसे करती थी  जिसे तुम सिर्फ महसूस कर पाने वाला कहती थी  सब झूठ था ना  हर बार बस यही कहकर यकीन दिलाती थी मुझे  कि नहीं, मुझे ऐतबार नहीं है तुम पर  और फिर तुम उससे ऐतबार को जस्टिफाई करने  उस टोपी को पहन लेती थी ना  सच सच बताना वो जो सुबह शाम की बातें  तुमने 4 लफ्ज़ों में खत्म कर दी  कुछ फर्क नहीं पड़ा ना  टोपी थी ना तुम्हारे पास  पहन लिया होगा उसे फिर से  या फिर मुझे एहसास ही नहीं था  कि तुमने मुझसे मिलते समय  कभी उतारी ही नहीं थी वो टोपी  खूब कमाल थी तुम्हारी ज़बान  बहुत सी बातें कहीं  पर शब्दों की कोई अहमियत नहीं थी ना  ख़ैर तुम्हारी फितरत ...
एक और लिख लूं सोचा शायद ये गम कम हो जाए  तेरे इंतजार में जो वक्त थमा था वो शायद वापस वक्त हो जाए । तुझे चाहा है खुद से भी ज्यादा, इसको कहूं या लिखूं  तेरे तक कोई यह बात ही पहुंचा दे, इतना तरस तो खुदा मुझ पर खाए । भरे मां के दरबार में तेरी दुआ की थी तुझे बता कर, तुझे याद है? एक तथास्तु तो मां, मेरी दुआ को भी दे दिया जाए । गमगीन सा है सब तेरे बिना यहां, सब जगह मायूसी सी छाई है  तुझे कोई और शहर रास आ जाए, तो ए खुदा इस बस्ती में आग लग जाए । मैं टूट चुका हूं, मैं हार चुका हूं, पर एक उम्मीद अब भी बाकी है  अब भी एक दफा तू पलट कर देख ले, तो ये जलती हुई बस्ती भी, लंका हो जाए । - राहुल