कुछ तो समझने की कोशिश कर मेरी इस दर्द-ए-खामोशी को, ऐसा ना हो कि पलकों पे सजाए ये ख्वाब इन्हीं आंसुओं की नदी में ही बह जाएं। - Rahul Garg
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Showing posts from January, 2018
Understanding LIFE
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इस भाग दौड़ की ज़िंदगी में, मैं रोज विचार बदल रहा हूं। उस रोज़, जब मैं परेशान था, तो गम के सिरहाने, तनहाई के आंचल में बैठ, आंसुओं की बारिश में भीगते हुए, मैं, वो हर एक दिन, हर एक पल, को कोस रहा था जिसने मुझे, अकेलेपन का एहसास दिलाया। परंतु, वहीं इक रोज़, खुशीयों के आंगन में, हंसी के सिरहाने, ख्वाबों के आंचल में बैठ, चेहरे पर मुस्कुराहट लिए, मैं, ज़िंदगी के उन हसीन लम्हों को भी, याद कर रहा था, जिन्होंने मुझे खुशियों के इस सागर से परिचित कराया। अब इसे समय का खेल कहो या मेरी नादानी, पर समय के इसी खेल में, जिंदगी को समझने की कोशिश कर रहा हूं मैं, शायद इसीलिए हर रोज़, विचार बदल रहा हूं मैं। - Rahul Garg
Reason to live on
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Sit in an absolute silence, Close your eyes, Listen to the breeze, Listen to your past.. That laughter, That sorrow, That excitement, That suffering, That pain, You are product of all that, Think about it, Analyze that, Something you choose, Somewhere you never had a choice, All that has passed, And you are still alive, Keep thinking, keep living.. - Rahul Garg
वो पतंग
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कुछ यूं ढील दी मैंने मांझे को उस पतंग की खातिर के एक गलती की हवा चली, और उसका रुख़ ही बदल गया। ऐसा नहीं कि मैंने, कोशिश नहीं की समेटने की, पर इस हवा ने शायद, डोर को ही कमज़ोर कर दिया। क्या वो पतंग मेरी नहीं थी? या डोर नहीं संभाली मैंने? क्या किसी और डोर ने काट दिया? या कुसूर उस हवा का था? . . नहीं जानता हूं मैं.... अब.. ना पतंग है ना डोर, बस हूं, तो मैं, मेरी तनहाई, और ये हवा है, जो हर पल तोड़ रही है मुझे। - Rahul Garg